चल पड़ी राजधानी के दिल की धड़कन

देहरादून वासियों के लिए अच्छी ख़बर है कि सालों से बंद पड़ी घंटा घर की सुइयाँ अब टिक-टिक कर चलने लगी हैं । इतना ही नहीं, इस घड़ी की टन-टन अब हर घंटे पर सुनी जा सकेगी ।

Ghanta Ghar

 

टीम न्यूज़ स्टूडियो

देहरादून: घंटा घर देहरादून की पहचान है । राजधानी का दिल कहे जाने वाले इस घंटाघर की धडकनें सालों से बंद पड़ी थीं । देहरादून वासियों के लिए अच्छी ख़बर है कि सालों से बंद पड़ी घंटा घर की सुइयाँ अब टिक-टिक कर चलने लगी हैं । इतना ही नहीं, इस घड़ी की टन-टन अब हर घंटे पर सुनी जा सकेगी । पिछले कई महीनों से घंटा-घर के सौन्दर्यीकरण का कार्य युद्ध-स्तर पर चल रहा था, जो अब लगभग पूर्ण हो चुका है ।

 

भारत के उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून के बीचों-बीच शान से खड़ा है घंटा-घर । इसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान अंग्रजों द्वारा करवाया गया था । षटकोणीय आकर में बने इस घंटाघर के शीर्ष पर छः मुखों पर छः घड़ियाँ लगी हैं । देहरादून का यह घंटाघर बिना घंटानाद का सबसे बड़ा घंटाघर है । ईंटों और पत्थरों से निर्मित इस ढाँचे की छः दीवारों पर छः प्रवेश द्वार हैं । इसके मध्य में स्थित सीढियाँ इसके उपरी तल तक ले जाती हैं, जहां कई खिड़कियाँ लगी हैं ।

 

नगर की तमाम ऐतिहासिक और सौंदर्यपूर्ण संरचनाओं में घंटाघर देहरादून की प्रमुख व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र है ।  कहते हैं कि राजपुर रोड के मुहाने पर स्थित घंटाघर का घंटा नाद देहरादून के सुदूर स्थानों से भी श्रव्य था, लेकिन हाल ही में यह नगर में एक चिन्ह मात्र रह गया था । इसके चारों ओर दुकाने, सिनेमाघर, सरकारी भवन, मॉल, पर्यटक स्थल, बाजार, इत्यादि बन गए हैं ।

काफी समय बाद देहरादून के घंटाघर की घड़ी पुनः एक बार चल पड़ी है  देहरादून के मेयर सुनील गामा ने बताया कि घड़ी को सुचारू रूप से फिर एक बार चलाने के लिए काफी समय से काम चल रहा था । उन्होंने बताया कि पुरानी घड़ी को नगर निगम में धरोहर के रूप में संजोकर रखा जाएगा । आने वाले समय में स्कूली बच्चे इस पुरानी घड़ी को देखकर देहरादून के इतिहास में झांक सकेंगे ।

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